Wednesday, April 4, 2018

ग्रीष्म ऋतू 

(श्रीधर पाठक)


जेठ के दारुण आतप से , तप के जगती तल जावै जला ,
नभ मंडल छाया मरुस्थल सा ,दल बाँध के अंधड़ आवै चला ,
जलहीन जलाशय , व्याकुल हैं पशु – पक्षी , प्रचंड है भानु कला ,
किसी कानन कुञ्ज के धाम में प्यारे ,करै बिसीराम चलौ तो भला |

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